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Showing posts from 2019

रीना का दादा-दादी रॉक बैंड

रीना जहां रहती थी, वहां हर कोई दुर्गा पूजा के उत्सव की तैयारी में लगा था। रीना के बड़े भैया का तो बोलबाला था। वह संगीत, नृत्य, गायन व खेलों में हमेशा अव्वल आते थे। वह कॉलेज जाने के बाद इन सबके अभ्यास में अपना वक्त बिताते थे। रीना उन्हें देख-देखकर हमेशा सोचती कि भैया की मोहल्ले में सब लोग जितनी तारीफ करते हैं, काश, मेरी भी उतनी ही तारीफ होती। वैसे रीना की तारीफ होती तो थी, लेकिन केवल पढ़ाई के लिए। वह पढ़ाई में तो खूब होशियार थी, लेकिन कुछ और भी ऐसा करना चाहती थी, जिससे लोग उसके बड़े भैया की तरह उसकी भी तारीफ करें। नन्ही रीना के दोस्तों में कोई फैंसी ड्रेस के लिए तैयारी कर रहा था, कोई सोलो डांस के लिए। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? वैसे करने को तो बहुत कुछ था, पर वह सबसे अलग कुछ करना चाहती थी।  एक दिन वह उसी सोच-विचार में डूबी थी कि रीना के रॉनी भैया ने उसे देखा। उन्होंने प्यार से आकर अपनी  नन्ही बहन से पूछा कि वह इतनी उदास क्यों बैठी है? नन्ही रीना तो इसी का इंतजार कर रही थी, क्योंकि भैया को परेशान करने की उसकी हिम्मत नहीं होती थी। उसके भैया इंजीनियरिंग की तैय...

सौ रुपए का नोट

सयारा देर से सोई। देर से सोई, तो देर से उठी। देर से उठी, तो हर काम में देर होती चली गई। वह दौड़ते-दौड़ते स्कूल बस तक पहुंच गई। एक पल की और देरी हो जाती, तो बस छूट ही जाती। वह बस में चढ़ी ही थी कि रीमा बोली, “एक ही सीट बची है। आखिर वाली।” सयारा बस में सबसे पीछे वाली सीट पर बैठ गई। स्कूल गेट आया। बस रुकी, बच्चे उतरने लगे। सयारा को सबसे बाद में उतरना था। अचानक उसकी नजर एक सीट के नीचे पड़ी। वहां सौ रुपए का एक नोट मुड़ा-तुड़ा पड़ा था। सयारा ने झट से वह नोट उठा लिया। उसने वह नोट मुट्ठी में बंद कर लिया। वह क्लास में आ पहुंची। पलक झपकते ही उसने नोट अपने स्कूल बैग में रख लिया।  सुबह स्कूल में प्रार्थना सभा हुई। अब पहला पीरियड गणित का था। सयारा का मन पढ़ाई में नहीं लग रहा था। वह सोच रही थी, ‘इंटरवल में कोल्ड ड्रिंक पिऊंगी। दो समोसे भी खाऊंगी। दो पैकेट चिप्स के भी लूंगी, तब भी रुपए बच ही जाएंगे।’ जैसे-तैसे पहला पीरियड बीता। दूसरा पीरियड हिंदी का था। लेकिन सयारा तो इंटरवल का इंतजार कर रही थी। वह सोचने लगी, ‘आज तो मजा आ गया। सौ रुपए तो बहुत ज्यादा होते हैं। मुझे दो-तीन दिन घर का टिफिन...

"ज्ञान सोने से ज्यादा मूल्यवान है"

पोस्ट पढ़िए ज्ञान से ओवरलोडेड है।🤣 एक बैंक डकेती के दौरान डाकुओ ने कहा :" सभी अपने हाथो को ऊपर कर लो यह पैसा देश का है पर जान आपकी अपनी" यह है ब्रेन वाश करना डकैती के दौरान एक महिला बदहवास सी हो गयी तो डाकू बोला " सभ्यता का परिचय दो यह केवल डकेती है कोई बलात्कार नहीं" यह है प्रोफेशनल होना 20 लाख रुपए लूट कर जब घर गए तो छोटा वाला डाकू बोला आओ पैसे गिनते है तो बड़े वाले ने कहा : " कल न्यूज़ में आजायेगी गिनने की क्या ज़रुरत" यह है अनुभव लुटने के बाद बैंक मेनेजर ने खजांची को बुलाया और कहा :" रुक पुलिस बुलाने से पहले 10 लाख निकाल के मेरे साले को देदे" यह है बहती गंगा में हाथ साफ़ करना खजांची बोला : ओके एक करोड़ चोरी हुए है ऐसा लिखवाता हूँ अपने पिछले 70 लाख भी कवर हो जायेंगे यह है मौके पे चौका अगले दिन न्यूज़ में आया " सिटी बैंक में 1 करोड़ की डकेती" डाकूओ ने बार बार गिने लेकिन 20 लाख ही निकले डाकू बोले हमने जान पर खेल कर 20 कमाए मेनेजर ने एक झटके में 80। इसे कहते है "ज्ञान सोने से ज्यादा मूल्यवान है"
Nice story...  रोम में एक बहुत प्रसिद्ध लोहार हुआ। उसकी प्रसिद्धि सारी दुनिया में थी, क्योंकि वो जो भी बनाता था, वो चीज़ बेजोड़ होती थी। उस लोहार की दुकान पर बनी तलवार का कोई सानी न था। और उस लोहार की दुकान पर बने सामानों का सारे जगत में आदर था। दूर-दूर के बज़ारों में उसकी चीज़ें बिकती थीं, उसका नाम बिकता था। फिर रोम पर हमला हुआ। और रोम में जितने प्रतिष्‍ठित लोग थे, पकड़ लिए गए। रोम हार गया। वो लोहार भी पकड़ लिया गया। वो तो काफ़ी ख़्यातिलब्ध आदमी था। उसके बड़े कारख़ाने थे। और उसके पास बड़ी धन–सम्पत्‍ति थी, बड़ी प्रतिष्‍ठा थी। वो भी पकड़ लिया गया। तीस, रोम के प्रतिष्‍ठित, जो सर्वशक्‍तिशाली आदमी थे, उनको पकड़ के दुश्मनों ने ज़ंजीरों और बेड़ियों में बाँध के पहाड़ों में फेंक दिया, मरने के लिए। जो उनतीस थे, वो तो रो रहे थे, लेकिन वो लोहार शान्त था। आख़िर उन उनतीसों ने पूछा कि, “तुम शान्त हो, हमें फेंका जा रहा है, जंगली जानवरों को खाने के लिए!” उसने कहा, “फ़िकिर मत करो, मैं हूँ, मैं लोहार हूँ। ज़िन्दगी भर मैंने बेडियाँ और हथकड़ियाँ बनाई हैं, मैं खोलना भी जानता हूँ। तुम घबड़ाओ मत। एक दफ़ा इनको फें...

नवल का क़त्ल सस्पेंस स्टोरी

सुबह करीब ७ बजे का समय था. नवल के घर पर उसकी नौकरानी जो की घर के हर काम कराती थी दरवाजे पर आई और डोर बेल बजाई, लेकिन कोई रिस्पोंस ना मिलने की दृष्टि में उसने फिर से डोर बेल बजाई. लेकिन फिर भी कोई रिस्पोंस नहीं आया. नवल का क़त्ल सस्पेंस स्टोरी ये साहब लोग भी ना कितना सोते हैं कहते हुए नवल की नौकरानी ऋतू ने दरवाजे को हलके से खटखटाया.....अरे  यह क्या दरवाजा तो खुला ही है...ऐसा कैसे..अमूमन ऐसा तो नहीं होता है......वह थोड़ी घबराई हुई इधर उधर देखते हुए साहेब...साहेब की आवाज लगाते हुए घर के अन्दर गयी और जब वह किचेन में पहुची तो उसकी चीख निकल पड़ी....वह उलटे पैर तेजी सी बाहर निकली और पड़ोस में रहने वाले रिषभ वर्मा के घर गयी....रिषभ वर्मा के घर से नवल के अच्छे सम्बन्ध थे और वे दोनों पडोसी भी थे. रिषभ की पत्नी ने दरवाजा खोलते हुआ कहा.....क्या हुआ ऋतू तू इतना घबराई क्यों है... ओ...ओ साह्रेब किधर हैं...बुलाओ...ऋ तू ने घबराहट में बोला...वह पसीने से टार बतर हो गयी थी. ओ तो नहीं हैं...लेकिन हुआ क्या वह तो बता....तू इतना घबराई हुई क्यों है....रिषभ की पत्नी दीपिका ने तोड़ा परेशान होते हुए बोला...

Aadhar card

,,जब एक शख्स लगभग पैंतालीस वर्ष के थे तब उनकी पत्नी का स्वर्गवास हो गया था। लोगों ने दूसरी शादी की सलाह दी परन्तु उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि पुत्र के रूप में पत्नी की दी हुई भेंट मेरे पास हैं, इसी के साथ पूरी जिन्दगी अच्छे से कट जाएगी। पुत्र जब वयस्क हुआ तो पूरा कारोबार पुत्र के हवाले कर दिया। स्वयं कभी अपने तो कभी दोस्तों के आॅफिस में बैठकर समय व्यतीत करने लगे। पुत्र की शादी के बाद वह ओर अधिक निश्चित हो गये। पूरा घर बहू को सुपुर्द कर दिया। पुत्र की शादी के लगभग एक वर्ष बाद दोहपर में खाना खा रहे थे, पुत्र भी लंच करने ऑफिस से आ गया था और हाथ–मुँह धोकर खाना खाने की तैयारी कर रहा था। उसने सुना कि पिता जी ने बहू से खाने के साथ दही माँगा और बहू ने जवाब दिया कि आज घर में दही  नहीं है। खाना खाकर पिताजी ऑफिस चले गये। थोडी देर बाद पुत्र अपनी पत्नी के साथ खाना खाने बैठा। खाने में प्याला भरा हुआ दही भी था। पुत्र ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और खाना खाकर स्वयं भी ऑफिस चला गया। कुछ दिन बाद पुत्र ने अपने पिताजी से कहा- ‘‘पापा आज आपको कोर्ट चलना है, आज आपका विवाह होने जा रहा है।’’...

गणेश चतुर्थी

पापा के पाँव में चोट लगी थी, कुछ दिनों से वे वैसे ही लंगडाकर चल रहे थे। मैं भी छोटा था और ऐन टाइम पर हमारे घर के गणेश विसर्जन के लिए किसी गाड़ी की व्यवस्था भी न हो सकी। पापा ने अचानक ही पहली मंजिल पर रहने वाले जावेद भाई को आवाज लगा दी : " ओ जावेद भाई, गणेश विसर्जन के लिए तालाब तक चलते हो क्या ? " मम्मी तुरंत विरोध स्वरूप बड़बड़ाने लगीं : " उनसे पूछने की क्या जरूरत है ? " छुट्टी का दिन था और जावेद भाई घर पर ही थे। तुरंत दौड़े आए और बोले : " अरे, गणपती बप्पा को गाड़ी में क्या, आप हुक्म करो तो अपने कन्धे पर लेकर जा सकता हूँ। " अपनी टेम्पो की चाबी वे साथ ले आए थे। गणपती विसर्जन कर जब वापस आए तो पापा ने लाख कहा मगर जावेद भाई ने टेम्पो का भाड़ा नहीं लिया। लेकिन मम्मी ने बहुत आग्रह कर उन्हें घर में बने हुए पकवान और मोदक आदि खाने के लिए राजी कर लिया। जिसे जावेद भाई ने प्रेमपूर्वक स्वीकार किया, कुछ खाया कुछ घर ले गए। तब से हर साल का नियम सा बन गया, गणपती हमारे घर बैठते और विसर्जन के दिन जावेद भाई अपना टेम्पो लिए तैयार रहते। हमने चाल छोड़ दी, बस्ती बदल गई, हमारा घ...

अधिकार-चिन्ता मुंशी प्रेम चंद 1

1 टामी यों देखने में तो बहुत तगड़ा था। भूँकता तो सुननेवाले के कानों के परदे फट जाते। डील-डौल भी ऐसा कि अँधेरी रात में उस पर गधे का भ्रम हो जाता। लेकिन उसकी श्वानोचित वीरता किसी संग्रामक्षेत्र में प्रमाणित न होती थी। दो-चार दफे जब बाजार के लेडियों ने उसे चुनौती दी तो वह उनका गर्व-मर्दन करने के लिए मैदान में आया और देखनेवालों का कहना है कि जब तक लड़ा जीवट से लड़ा नखों और दाँतों से ज्यादा चोटें उसकी दुम ने की। निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि मैदान किसके हाथ रहा किंतु जब उस दल को कुमक मँगानी पड़ी तो रण-शास्त्रा के नियमों के अनुसार विजय का श्रेय टामी ही को देना उचित न्यायानुकूल जान पड़ता है। टामी ने उस अवसर पर कौशल से काम लिया और दाँत निकाल दिये जो संधि की याचना थी। किंतु तब से उसने ऐसे सन्नीति-विहीन प्रतिद्वंद्वियों के मुँह लगना उचित न समझा। इतना शांतिप्रिय होने पर भी टामी के शत्रुओं की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जाती थी। उसके बराबरवाले उससे इसलिए जलते कि वह इतना मोटा-ताजा हो कर इतना भीरु क्यों है। बाजारी दल इसलिए जलता कि टामी के मारे घूरों पर की हड्डियाँ भी न बचने पाती थीं। वह घड़ी-रात रहे उठत...

अग्नि-समाधि मुंशी प्रेम चंद

साधु-संतों के सत्संग से बुरे भी अच्छे हो जाते हैं, किन्तु पयाग का दुर्भाग्य था, कि उस पर सत्संग का उल्टा ही असर हुआ। उसे गाँजे, चरस और भंग का चस्का पड़ गया, जिसका फल यह हुआ कि एक मेहनती, उद्यमशील युवक आलस्य का उपासक बन बैठा। जीवन-संग्राम में यह आनन्द कहाँ ! किसी वट-वृक्ष के नीचे धूनी जल रही है, एक जटाधारी महात्मा विराज रहे हैं, भक्तजन उन्हें घेरे बैठे हुए हैं, और तिल-तिल पर चरस के दम लग रहे हैं। बीच-बीच में भजन भी हो जाते हैं। मजूरी-धातूरी में यह स्वर्ग-सुख कहाँ ! चिलम भरना पयाग का काम था। भक्तों को परलोक में पुण्य-फल की आशा थी, पयाग को तत्काल फल मिलता था , चिलमों पर पहला हक उसी का होता था। महात्माओं के श्रीमुख से भगवत् चर्चा सुनते हुए वह आनंद से विह्वल हो उठता था, उस पर आत्मविस्मृति-सी छा जाती थी। वह सौरभ, संगीत और प्रकाश से भरे हुए एक दूसरे ही संसार में पहुँच जाता था। इसलिए जब उसकी स्त्री रुक्मिन रात के दस-ग्यारह बज जाने पर उसे बुलाने आती, तो पयाग को प्रत्यक्ष क्रूर अनुभव होता, संसार उसे काँटों से भरा हुआ जंगल-सा दीखता, विशेषत: जब घर आने पर उसे मालूम होता कि अभी चूल्हा नहीं जला...

क्षमा मुंशी प्रेम चंद

मुसलमानों को स्पेन-देश पर राज्य करते कई शताब्दियाँ बीत चुकी थीं। कलीसाओं की जगह मसजिदें बनती जाती थीं, घंटों की जगह अजान की आवाजें सुनाई देती थीं। ग़रनाता और अलहमरा में वे समय की नश्वर गति पर हँसनेवाले प्रासाद बन चुके थे, जिनके खंडहर अब तक देखनेवालों को अपने पूर्व ऐश्वर्य की झलक दिखाते हैं। ईसाइयों के गण्यमान्य स्त्री और पुरुष मसीह की शरण छोड़कर इस्लामी भ्रातृत्व में सम्मिलित होते जाते थे, और आज तक इतिहासकारों को यह आश्चर्य है कि ईसाइयों का निशान वहाँ क्योंकर बाकी रहा ! जो ईसाई-नेता अब तक मुसलमानों के सामने सिर न झुकाते थे, और अपने देश में स्वराज्य स्थापित करने का स्वप्न देख रहे थे उनमें एक सौदागर दाऊद भी था। दाऊद विद्वान और साहसी था। वह अपने इलाके में इस्लाम को कदम न जमाने देता था। दीन और निर्धन ईसाई विद्रोही देश के अन्य प्रांतों से आकर उसके शरणागत होते थे और वह बड़ी उदारता से उनका पालन-पोषण करता था। मुसलमान दाऊद से सशंक रहते थे। वे धर्म-बल से उस पर विजय न पाकर उसे अस्‍त्र-बल से परास्त करना चाहते थे; पर दाऊद कभी उनका सामना न करता। हाँ, जहाँ कहीं ईसाइयों के मुसलमान होने की खबर पाता, ह...

हार की जीत मुंशी प्रेम चंद

केशव से मेरी पुरानी लाग-डाँट थी। लेख और वाणी, हास्य और विनोद सभी क्षेत्रों में मुझसे कोसों आगे था। उसके गुणों की चंद्र-ज्योति में मेरे दीपक का प्रकाश कभी प्रस्फुटित न हुआ। एक बार उसे नीचा दिखाना मेरे जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा थी। उस समय मैंने कभी स्वीकार नहीं किया। अपनी त्रुटियों को कौन स्वीकार करता है पर वास्तव में मुझे ईश्वर ने उसकी जैसी बुद्धि-शक्ति न प्रदान की थी। अगर मुझे कुछ तस्कीन थी तो यह कि विद्याक्षेत्र में चाहे मुझे उनसे कंधा मिलाना कभी नसीब न हो, पर व्यवहार की रंगभूमि में सेहरा मेरे ही सिर रहेगा। लेकिन दुर्भाग्य से जब प्रणय-सागर में भी उसने मेरे साथ गोता मारा और रत्न उसी के हाथ लगता हुआ नजर आया तो मैं हताश हो गया। हम दोनों ने ही एम.ए. के लिए साम्यवाद का विषय लिया था। हम दोनों ही साम्यवादी थे। केशव के विषय में तो यह स्वाभाविक बात थी। उसका कुल बहुत प्रतिष्ठित न था, न वह समृद्धि ही थी जो इस कमी को पूरा कर देती। मेरी अवस्था इसके प्रतिकूल थी। मैं खानदान का ताल्लुकेदार और रईस था। मेरी साम्यवादिता पर लोगों को कुतूहल होता था। हमारे साम्यवाद के प्रोफेसर बाबू हरिदास भाटिया ...